February 22, 2024

श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 19 अक्टूबर 2020।🗓आज का पञ्चाङ्ग🗓

शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।
* वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।
* नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।
* योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।
* करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।
इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना, पढ़ना चाहिए ।
🌻सोमवार, 19 अक्टूबर 2020🌻

सूर्योदय: 🌄 06:43
सूर्यास्त: 🌅 17:59
चन्द्रोदय: 🌝 09:15
चन्द्रास्त: 🌜20:16
अयन 🌕 दक्षिणायने
ऋतु: ❄️ शरद
शक सम्वत: 👉 1942
विक्रम सम्वत: 👉 2077
मास 👉 आश्विन
पक्ष 👉 शुक्ल
तिथि: 👉 तृतीया (14:07 तक)
नक्षत्र: 👉 अनुराधा (27:52तक)
योग: 👉 आयुष्मान् (13:19तक)
प्रथम करण: 👉 गर (14:07 तक)
द्वितीय करण: 👉 वणिज (12:38 तक)
अभिजित मुहूर्त: 👉 11:59-12:44
दिशा शूल: 👉 पूर्व
राहुकाल: 👉 08:08-09:32
चन्द्र वास: 👉 उत्तर
सूर्य 🌟 तुला
चंद्र 🌟 वृश्चिक
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☄चौघड़िया विचार☄
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॥ दिन का चौघड़िया ॥
१ – अमृत =06:43-08:08
२ – काल =08:08-09:32
३ – शुभ =09:32-10:57
४ – रोग =10:57-12:21
५ – उद्वेग =12:21-01:46
६ – चर =01:46-03:10
७ – लाभ =03:10-04:35
८ – अमृत =04:35-05:59

॥रात्रि का चौघड़िया॥
१ – चर =05:59-07:35
२ – रोग =07:35-09:11
३ – काल =09:11-10:46
४ – लाभ =10:46-12:22
५ – उद्वेग =12:22-01:57
६ – शुभ =01:57-03:33
७ – अमृत =03:33-05:08
८ – चर =05:08-06:44

नवरात्री के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी के नाम से जाना जाता है। माँ चंद्रघंटा के शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। माता के दस हाथ हैं जिनमे तलवार, त्रिशूल, खड्ग, बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। माता का वाहन सिंह है। मां चंद्रघंटा की कृपा से भक्तो के समस्त संकटो और पापो का नाश हो जाता हैं। आज माँ के मन्त्र का जाप अवश्य करें

“या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।”

इसके अलावा मां को सफेद चीज का भोग जैसे दूध या खीर का भोग लगाना चाहिए। इसके अलावा माता चंद्रघंटा को शहद का भोग भी लगाया जाता है।
(पंडित विष्णुदत्त शास्त्री)

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