June 23, 2026
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श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स के पाठकों के लिए कुमार हरिओम की विशेष रिपोर्ट सीधे गुवाहाटी से।

विश्वप्रसिद्ध अंबुवाची मेले की शुरुआत हो चुकी है। गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत स्थित प्रमुख शक्तिपीठ मां कामाख्या मंदिर में प्रतिवर्ष 22 से 26 जून तक आयोजित होने वाले मेले में देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु पहुंच चुके है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां के रजस्वला के दौरान तीन दिन अपनी शक्तियों के संचार का यह सबसे उपयुक्त समय माना है। मां के रजस्वला के दौरान यहां तीन दिन साधना करने से मां का आशीर्वाद 100 गुना अधिक प्राप्त होता है। कामाख्या देवालय के प्रमुख पंडा (पंडित) के अनुसार, अंबुबाची मेले के दौरान मां कामाख्या मंदिर ही नहीं अपितु आसपास क्षेत्र के सभी बड़े और छोटे मंदिरों के पट भी तीन दिन बंद रहते है। इस दौरान यहां भजन कीर्तन होते है, उसके बाद पूरे विधि विधान के साथ मंदिरों के पट खोलकर पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के पट खुलने के बाद ही श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे।
मान्यता है कि इस दौरान मां की उपासना से सारी नेगेटिव एनर्जी का सर्वनाश होने के साथ पॉजिटिव एनर्जी का उद्गम होता है। इसलिए इन दिनों में सभी साधु संत अपनी साधनाओं का संचार करते है। रोचक बात है कि ये देश का इकलौता शक्तिपीठ है जहां मां कामाख्या के अलावा तांत्रिक भैरव, तांत्रिक गणेश और तांत्रिक हनुमान जी की पूजा होती है, जो अपने आप में अद्भुत है।

तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र
कामाख्या मंदिर को तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि नीलांचल पर्वत पर दसों महाविद्याओं के विभिन्न मंदिर या पीठ स्थित हैं। इसी कारण कामाख्या को महाविद्या साधना का अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। एक प्रसिद्ध शाक्त कथा के अनुसार जब माता सती ने भगवान शिव को रोकने के लिए दस दिशाओं में अपने दस स्वरूप प्रकट किए, तब दस महाविद्याओं का प्राकट्य हुआ। कामाख्या स्थित नीलांचल पर्वत पर दसों महाविद्या के मंदिर भी स्थित है। दस महाविद्याओं का पारंपरिक क्रम इस प्रकार माना जाता है।मां काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला है। याद रखने के लिए एक सरल क्रम : काली → तारा → षोडशी → भुवनेश्वरी → भैरवी → छिन्नमस्ता → धूमावती → बगलामुखी → मातंगी → कमला। तांत्रिक दृष्टि से यह क्रम शक्ति के उग्रतम रूप (काली) से लेकर सौम्य एवं समृद्धि प्रदान करने वाले रूप (कमला) तक की आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि यहां साधु, संत, तांत्रिक, अघोरी, किन्नर इस दौरान अपनी साधना पूरी करते है।

बस नाम का अंतर है अंबुबाची और अंबुवाची
नॉर्थ ईस्ट को छोड़कर देशभर में अंबुबाची और अंबुवाची को मेले के नाम को लेकर हमेशा कंफ्यूज़न वाली स्थिति बनी रहती है। कामाख्या देवालय के पंडा (पंडित) के अनुसार अंबुबाची शब्द असमिया और बंगाली उच्चारण में प्रचलित रूप। आम बोलचाल और मीडिया में “अंबुबाची मेला” नाम अधिक प्रसिद्ध है। कामाख्या मंदिर प्रशासन और स्थानीय लोग भी प्रायः इसी नाम का प्रयोग करते हैं। हालांकि तांत्रिक और धार्मिक ग्रंथों में प्रायः “अंबुवाची” शब्द ही मिलता है।इसे संस्कृत मूल का शब्द भी माना गया है। इसका संबंध धरती माता की सृजन शक्ति और वर्षा ऋतु के आगमन से जोड़ा गया है। इसलिए दोनों ही शब्दों में भले ही अंतर हो लेकिन दोनों के भाव एक ही है।

लाल चीर का विशेष महत्व
अंबुवाची केवल एक मेला नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति, सृजन, प्रकृति और शक्ति-तत्व के सम्मान का पर्व माना गया है। इस अवधि में माता कामाख्या के रजस्वला होने की मान्यता है। मान्यता है कि मां के रजस्वला के दौरान गर्भगृह में योनिभाग पर सफेद कपड़ा लगाया जाता है जो तीन दिन के बाद स्वतः ही लाल हो जाता है। इसे माता की कृपा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस अंगवस्त्र को बेहद पवित्र माना गया है। मंदिर के पट खुलने के बाद पंडों द्वारा श्रद्धालुओं उस वस्त्र के छोटे-छोटे टुकड़े प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं। इसे अंगवस्त्र, रक्तवस्त्र या आम बोलचाल में “लाल चीर” कहा जाता है। इसे पूजा-स्थान, तिजोरी या अपने पास सुरक्षित रखते हैं। मंदिर के पट खुलने के बाद इसे पाने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह रहता है।

गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करते हैं यहां के स्थानीय
ये सनातन की ही खूबसूरती है कि मुस्लिम बाहुल्य असम में स्थित मां कामाख्या मंदिर में आयोजित होने वाले अंबुवाची मेले में यहां के स्थानीय मुस्लिम बहुल के लोग सबसे अधिक भागीदारी निभाते है। स्थानीय लोगों की मानें तो मां के दरबार में मत्था टेकने से लेकर मेले के दौरान आने वाले श्रद्वालुओं की सेवा में यहां के स्थानीय लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है। इसके अलावा पूरे साल असम समेत आसपास के राज्यों से काफी संख्या में मुस्लिम श्रद्धालु मां कामाख्या मंदिर में मत्था टेकने आते है। जहां उनकी मनोकामना पूरी होती है।