


श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 29 अगस्त 2026। चुनाव लोकतंत्र का पर्व है… जनता अपने वार्ड का प्रतिनिधि चुनती है… लेकिन टिकट वितरण की तस्वीर ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जब पार्षद चुनना जनता को है, तो उम्मीदवार तय करने में जनता की पसंद कितनी मायने रख रही है? नगरपालिका चुनाव में टिकट के लिए हर वार्ड में दावेदार सक्रिय हैं। कहीं समर्थक अपने पसंदीदा चेहरे के लिए पैरवी कर रहे हैं तो कहीं दावेदार पार्टी के बड़े नेताओं के दरवाजे खटखटा रहे हैं। लेकिन अंतिम फैसला अभी भी पार्टी के बंद कमरों में अटका हुआ है नामांकन का सिर्फ एक दिन बाकी है और सभी वार्डों में टिकट को लेकर सस्पेंस बरकरार है।
वार्ड की पसंद या पार्टी के खेमे की पसंद?
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। हर वार्ड में दावेदारों की अपनी-अपनी दावेदारी है। कोई वर्षों से पार्टी के साथ खड़ा होने का दावा कर रहा है तो कोई अपने जन समर्थन को टिकट का आधार बता रहा है। समर्थक भी खुलकर अपने चेहरे को वार्ड की पसंद बता रहे हैं। लेकिन असली फैसला पार्टी के हाथ में है। यहीं से सवाल उठता है— क्या टिकट उस चेहरे को मिलेगा जिसे वार्ड चाहता है, या उस चेहरे को जिसे पार्टी का खेमा चाहता है? और अगर पार्टी खेमे की पसंद जनता की पसंद पर भारी पड़े तो सवाल उठना लाजमी ही है कि पार्षद को पार्टी कार्यालय में नहीं, वार्ड की गलियों में जनता के बीच जाकर पांच साल काम करना है तो फिर जनता की पसंद को उपेक्षित क्यों करना।
बागी मनाने की बजाय बागी बनने का वक्त ही नही देने की रणनीति।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। टिकट वितरण में आखिरी समय तक सस्पेंस को राजनीतिक रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। वजह साफ है—अगर टिकट समय रहते घोषित हो जाए तो टिकट से वंचित दावेदार के पास निर्दलीय नामांकन दाखिल करने, समर्थकों को लामबंद करने और पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ मोर्चा खोलने का पूरा समय रहेगा। लेकिन नामांकन की अंतिम तारीख से ठीक पहले या नामांकन की अंतिम दिनांक के बाद नामांकनों की जांच के समय पर टिकट सामने आए तो? नाराजगी के लिए वक्त कम… बगावत के लिए वक्त कम… और नामांकन की तैयारी के लिए भी वक्त कम! यानी पार्टियों के सामने बागियों को मनाने की मुश्किल खड़ी ही न हो, इसके बजाय बागी बनने का मौका और समय ही सीमित कर दिया जाए। यह रणनीति पार्टी के लिए भले ही चुनावी गणित का हिस्सा हो, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि क्या टिकट वितरण जनता की पसंद को ध्यान में रखकर हो रहा है या पार्टी अपने-अपने खेमों का हिसाब बैठा रही है? वहीं दूसरी और चुनाव लड़ने का मन बना चुके दावेदार पार्टियों के इस खेल को समझ चुके है एवं अपना नामांकन पार्टी के साथ साथ निर्दलीय के रूप में भी भरवा रहे है।




