






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स के फैसबुक पेज पर एक लाख फॉलोवर पूरे होने पर क्षेत्र की कुछ अनकही व अनसुनी चर्चाओं को पाठकों तक पहुंचाने के लिए ये रोचक साप्ताहिक कॉलम शुरू किया गया है। क्षेत्र में राजनीतिक, प्रशासनिक एवं सामाजिक हलकों की वह चर्चाएं इस कॉलम के माध्यम से की जाएगी, जिनकी चर्चा अनकही और अनसुनी ही रह जाती है। विदित रहें गत चुनावों में टाइम्स द्वारा यह विशेष आलेख प्रतिदिन सीरिज के रूप में चलाया गया जिसने क्षेत्र में खासी लोकप्रियता बटोरी। टाइम्स टीम का प्रयास रहेगा कि पाठकों के समक्ष क्षेत्र के अंदरखाने की चर्चाओं को पहुंचाया जा सकें।
वहीं आपके पास यदि कोई जानकारी अनकही अनसुनी हो तो आप भी उसे साझा कर सकते है, आप हमें 94149 17401 पर मैसेज भेजकर जानकारी दे सकते है।
समाजवाद फीका पड़ने से बे-मौसम हो गई बे-रूखी की बरसात, नहीं मिलने वाली गर्माहट से राहत।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। बेमौसम बारिश से किसी का फायदा नहीं होता और गर्मी भी कम होने के बजाए बढ़ जाती है। यही देखने को मिल रहा है इन दिनों प्रशासनिक एवं राजनीतिक हल्के में। यहां समाजवाद को महत्व देते हुए सत्ता ने अपनी पंसद से प्रशासनिक मुखिया का पदस्थापन श्रीडूंगरगढ़ करवाया। सब ठीक ठाक भी चल रहा था लेकिन हाल ही में हुए एक भूमि प्रकरण में समाजवाद का असर थोड़ा फीका पड़ता नजर आया है। दिक्कत यह हुई कि प्रकरण में सत्ता धारियों की नापसंद समाज के नेता की बात सुनना सत्ता को पंसद नहीं आया। अब अनकही अनसुनी यह है कि सत्ता का समाजवाद से मोह भंग हो गया और प्रशासनिक मुखिया पद पर पसंद बदलते हुए नई डिजायर भी दे दी गई है। लेकिन जानकारों का कहना यह है कि यह बेरूखी की बारिश बेमौसम हो गई है, क्योंकि अभी मौसम जनगणना का चल रहा है। जनगणना के चलते नई पंसद के प्रशासनिक मुखिया को ला पाना मुश्किल है। ऐसे में अब मामला पुन: राजीरजा के प्रयासों की ओर अग्रसर है।
ना निगलते बने ना उगलते बने, सिपहसालार फंसे धर्मसंकट में।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। कई बार जीवन में ऐसी स्थितियां आ जाती है कि ना तो सहन कर सकते और ना ही बयां कर सकते, कुछ ऐसी ही स्थितियों से गुजर रहे है शहर के वो कार्यकर्ता, जो चुनावों के समय जोरों शोरों से नारे गुंजा रहें थे। अब इन जुबानों पर हालातों को बंया करने से मौन छा गया है। शहर में सफाई एवं सड़कों के हालातों के चलते मौन धारक इन जुबानों के सामने अब भंयकर गर्मी और इसपर पेयजल किल्लत के कारण बड़ा धर्मसकंट आ गया है, कि ना निगलते बने ना उगलते बने। कार्यकर्ताओं के अगुवा नेताजी के संबोधनों में तो यह साफ संदेश दिया जाता है, कि शहर में कोई समस्या ही नहीं है। अब आका कह रहे है कि समस्या नहीं है तो भयंकर गर्मी में पेयजल संकट पर कौन जुबान खोले। मौसम विभाग की घोषणा यह है कि इस बार का मौसम 140 वर्षों में सर्वाधिक गर्मी वाला रहेगा और गर्मी की शुरूआत में ही हालात यह हो गए है कि कूलर में पानी तो दूर पीने को भी पानी नहीं मिल पा रहा है। हां यह अलग बात है कि ऐसे मौके पर दरें महंगी कर टैंकर चालक चौके मार रहें है। इन हालातों का शिकार भाजपाई भी हो रहे है और मौन धारण कर टैंकर चालकों को भुगतान कर रहे है। मोहल्लेवासियों की शिकायतों के साथ साथ खुद की जेब पर भी पड़ रहे भार के कारण मन में बातें कई है बोलने की, लेकिन “ना निगलते बने और न उगलते बने”की असमंजस की स्थिति में बोले कौन।
अति चालाक मांगे नौ घर, दसवें घर में खोय। न कर बैरी जल्दबाजी, धन धंधे से होए।।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। “अति चालाक मांगें नौ घर, दसवें घर में खोय। न कर बैरी जल्दबाजी, धन धंधे से होए”। वित्त विषय में महारत हासिल करने वाले विद्वानों द्वारा फाईनेंस एवं इनवेस्टमेंट के माध्यम से आमजन को लाभाविंत तो किया जाता है, लेकिन कई बार अति चालाकी का शिकार होकर ये विद्वान भी ठगे जाते है। ऊपर कही लोकोक्ति का प्रत्यक्ष इन दिनों शहर में देखा गया जहां वित्त विषय के विशेषज्ञों द्वारा भी फास्ट एवं हाई रिर्टन के चक्कर में एक बड़ी रकम गंवा दी गई। दूसरों को फाईनेंस एवं इनवेंस्टमेंट की सलाह देने वाले एक प्रोफेशनल विद्वान को भी गिरोह बना कर हाई रिर्टन देने के चक्कर में इनवेस्टमेंट करवा ली गई। शुरू शुरू में तो छोटे इनवेस्ट पर बड़ा रिर्टन दिया गया एवं जैसे ही इनवेस्टमेंट बड़ा हुआ, वैसे ही वही हुआ जो हाई-रिर्टन के लालच में सामान्यतया आमजन के साथ भी होता है। इनवेस्टमेंट कम्पनी ने अपनी डीजिटल करेंसी देकर गायब कर ली एवं सभी प्रकार के सम्पर्क भी टूट गए। शहर में कई दिनों से चर्चित हो रहे इस प्रकरण में अनकही अनसुनी यह है कि इस डिजिटल ठगी के मामले में पैसे खोने से ज्यादा दर्द विद्वान को खुद के ठगों का आसान शिकार बन जाने के प्रचार से हो रहा है। अब विद्वान का प्रयास ठगे गए पैसे की रिकवरी से ज्यादा अपने ठगे जाने के प्रचार को रोकने का किया जा रहा है। लेकिन कहते है कि जहां आग लगेगी वहां धूंआ होगा और धूंआ तो दूर से नजर भी आएगा।
आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। ज्ञानवान महकमे के आला अफसर ने हाल ही में क्षेत्र का दौरा किया। दौरे के बाद बड़े अफसर की रवानगी तो यहां से राजी रजा ही हुई लेकिन जिला कार्यालय पहुंचने के साथ ही साहब की नाराजगी कागजों पर उतर आई। बड़े अफसर ने क्षेत्र के संस्था प्रधानों के नाम कारण बताओ आदेश भी जारी कर दिए। इस नाराजगी की चपेट में क्षेत्र में सीधे सरल की छवि रखने वाले एक संस्था प्रधान भी बेवजह लपेटे में आ गए। इस प्रकरण के बाद महकमे के अनेक संस्था प्रधान नाराज हुए और अपनी नाराजगी भी अफसर तक पहुंचा दी। अंदरखाने में चर्चाएं यही रही कि कमी हो ना हो अफसरशाही का रोब तो रहना ही चाहिए। अनकही अनसुनी यही है कि बड़े साहब “आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।“ अब इन हालातों पर रोष तो बढ़ेगा ही। पढें आज के श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स अखबार में विशेष साप्ताहिक कॉलम अनकही अनसुनी:-





