श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 6 नवंबर 2026। सरपंचाई के चुनाव में गांवों की जनता ने अपने जनादेश से ग्रामीण राजनीति की नई तस्वीर सामने रख दी है। कहीं राजनीतिक परिवारों का प्रभाव देखने को मिला तो कहीं सक्रिय नेताओं को ग्रामीणों ने सरपंचाई की कुर्सी तक पहुंचाया। कई पूर्व और निवर्तमान सरपंचों पर जनता ने पुनः भरोसा जताया, वहीं कुछ पुराने चेहरों को चुनावी मैदान में पराजय का सामना करना पड़ा। जनता ने रीड़ी, गुसाईंसर बड़ा, आड़सर, उदरासर और लखासर के वर्तमान सरपंचो को ही पुन: चुनकर मौका दिया है। ये चेहरे लगातार 10 वर्ष अपनी ग्राम पंचायत का नेतृत्व करने वाले चेहरे बनेंगे। चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि ग्रामीण राजनीति में राजनीतिक पहचान, परिवार का प्रभाव और जनता के बीच सक्रियता के साथ मतदाताओं का अपना निर्णय भी निर्णायक रहा है।
पूर्व सरपंचों की वापसी, कई पुराने चेहरों पर फिर भरोसा
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। सरपंचाई के चुनाव में कई निवर्तमान सरपंचों को ग्रामीणों ने दोबारा मौका दिया है। रीड़ी में निवर्तमान सरपंच गुड्डीदेवी के पति एवं सरपंच प्रतिनिधि रहे हेतराम जाखड़ ने पुनः जीत हासिल की। उदरासर में निवर्तमान सरपंच किशनाराम गोदारा, लखासर में निवर्तमान सरपंच प्रतिनिधि गोवर्धन खिलेरी, आड़सर में निवर्तमान सरपंच कलावती देवी के जेठ भगवती प्रसाद जोशी तथा गुसाईंसर बड़ा में निवर्तमान सरपंच सत्यनारायण सारस्वत की पत्नी कौशल्या को लगातार दूसरी बार अवसर देकर भरोसा जताया है। वहीं ऊपनी में पूर्व सरपंच हरिराम गोदारा को जनता ने वापस चुना। बाना में पूर्व सरपंच मेनका एक कार्यकाल के बाद फिर सरपंच बनीं। उनके प्रतिनिधि एवं पूर्व सरपंच भंवरलाल बाना को भी ग्रामीणों का समर्थन मिला। राजेडू में पूर्व सरपंच श्रवण मदेरणा ने जीत दर्ज की। मोमासर में पूर्व सरपंच रामूराम गोदारा के पुत्र मनफूल गोदारा को ग्रामीणों ने सरपंचाई सौंपी। जैतासर में पूर्व सरपंच ओमप्रकाश सेन पर भी जनता ने पुनः भरोसा जताया। सांवतसर में भी महीराम विश्नोई के भाई की पत्नी कविता सुशील विश्नोई सरपंच बनी है। समंदसर में भी पूर्व सरपंच पोमाराम को और कुनपालसर में पूर्व सरपंच भंवरलाल कंस्वा की पत्नी को भी ग्रामीणों ने दोबारा अवसर देकर विश्वास जताया।
पुराने सरपंचों को जनता ने हराया
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। ग्रामीण राजनीति में बदलाव की तस्वीर भी सामने आई। बींझासर में निवर्तमान सरपंच को पराजय का सामना करना पड़ा। तोलियासर में पूर्व सरपंच गिरधारीसिंह, जोधासर में भंवरसिंह और बरजांगसर में पूर्व सरपंच प्रियंका सिहाग को ग्रामीणों ने चुनाव में हराया। शेरूणा में पूर्व सरपंच तोलाराम भादू तथा एडवोकेट बाबूलाल सारस्वत भी सरपंचाई की दौड़ में पीछे रह गए।
जनता ने इन राजनीतिक चेहरों पर जताया भरोसा
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। क्षेत्र में भारतीय किसान संघ में सक्रिय और भाजपा नेता के रूप में पहचान रखने वाले तोलाराम जाखड़ की पत्नी भंवरीदेवी जाखड़ को इंदपालसर गुसाईंसर की जनता ने भारी समर्थन देकर सबसे बड़ी जीत का तोहफा दिया। पूर्व जिला प्रमुख मेघाराम महिया की पत्नी कल्याणसर पुराना में 47 मतों से विजयी हुईं। भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष कोडाराम भादू ने सूडसर में 599 मतों से जीत दर्ज कर ग्रामीणों का विश्वास हासिल किया। केंद्रीय कानून मंत्री के पीए विक्रम राजपुरोहित की पत्नी ज्योति राजपुरोहित को तोलियासर में 111 मतों से जीत मिली। जैसलसर में कांग्रेस नेता चांदराम चाहर की पत्नी ने सरपंच पद हासिल किया। सीपीआईएम नेता मालचंद नैण की पुत्रवधू एवं पूर्व सरपंच ने भी पुनः जीत दर्ज की। सत्तासर में दिवंगत भाजपा नेता विक्रमसिंह की पत्नी मंगेज कंवर को ग्रामीणों ने भारी समर्थन दिया। जिला परिषद सदस्य हरिराम गोदारा की पत्नी भी सरपंच निर्वाचित हुईं। उल्लेखनीय है कि हरिराम गोदारा की माता भी पूर्व में सरपंच रह चुकी हैं।
जनता की अदालत में कई राजनीतिक चेहरे हुए पराजित
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। चुनावी मैदान में कई राजनीतिक परिवारों और सक्रिय नेताओं को भी मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया। पूर्व प्रधान सूरजमल भुवांल की पुत्रवधू को हार का सामना करना पड़ा। पूर्व जिला परिषद सदस्य धाईदेवी के पति मांगीलाल बाना भी सरपंचाई हासिल नहीं कर सके। दलित एवं कांग्रेस नेता राजेंद्र बापेऊ को भी ग्रामीणों ने पराजित किया। भाजपा नेता सीताराम सोनी की पुत्रवधू को भी चुनाव में हार मिली। इन परिणामों ने दर्शाया कि राजनीतिक पहचान और पूर्व सक्रियता के बावजूद मतदाताओं का समर्थन जीत की गारंटी नहीं बना।
जनादेश ने दिया गांवों की राजनीति का संदेश
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। पंचायती राज चुनाव के इन परिणामों में ग्रामीण मतदाताओं ने कहीं पुराने नेतृत्व को स्वीकार किया तो कहीं नए चेहरों को अवसर दिया। राजनीतिक परिवारों के प्रत्याशियों को भी जीत और हार दोनों का सामना करना पड़ा। पूर्व एवं निवर्तमान सरपंचों की वापसी के साथ कई जगह बदलाव की लहर भी दिखाई दी। चुनाव परिणामों ने एक बार फिर साबित किया कि गांवों की राजनीति में अंतिम निर्णय मतदाता का ही होता है। जनता का विश्वास हासिल करने वाले चेहरे सरपंचाई तक पहुंचे, जबकि जिनके पक्ष में जनसमर्थन नहीं बना, उन्हें चुनावी मैदान से बाहर होना पड़ा।