





श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 23 सितम्बर 2026। श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के राजनैतिक कार्यकर्ता, विभिन्न पार्टियों के सर्मथक एवं आम जनता राजनेताओं द्वारा अपनी उपेक्षा महसूस कर रही थी। नगरपालिका चुनाव 2026 में परिणाम जोड़-तोड़ से चाहे जो भी रहा हो लेकिन असली विजय तो उन कार्यकर्ताओं, सर्मथकों एवं आमजन की हुई है, जिन्हें चापलूसी के चलते पीछे कर दिया गया था। यह किसी एक दल या नेता की बात नहीं, बल्कि सभी पार्टियों के यही हाल देखे जा रहे थे, जहां नेता अपने चापलुसों पर आंख मूंद कर विश्वास कर रहे थे एवं नेताओं के कानों में भी सच्चाई के बजाए केवल प्रशंसा ही पहुंच रही थी। इस बार के निकटवर्ती रहे चुनावों के बाद अब इन नेताओं की आंखें एवं कान दोनों खुल गए है व आम कार्यकर्ता, जनता को महत्व सभी पार्टियों के नेता देना शुरू कर चुके है। यही असल मायने में जनता की जीत हुई है, पढ़ें इस चुनावों के बाद खड़े हुए सवालों की खास टिप्पणी।
कांग्रेस पर उठा सवाल, क्या भाजपा को सत्ता से दूर करना लक्ष्य था भी या नहीं..?
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। नगरपालिका चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी का खिताब पिछले करीब 40 सालों से पालिका में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस को मिला और परिणाम के दिन से ही कांग्रेस के मूल कार्यकर्ता, सर्मथक अपने नेतृत्व के भरोसे एकदम निश्चितं हो गए कि इस बार कांग्रेस को अपना 40 वर्षों से खोया हुआ पालिका बोर्ड बनाने का सम्मान मिल सकेगा। लेकिन कांग्रेस के मतदाताओं, सर्मथकों के लिए अप्रत्याशित रहे पालिकाध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष चुनावों के परिणामों के बाद सवाल यही उठा कि क्या कांग्रेस बोर्ड बनाना भी चाहती थी या नहीं..? आमजन में यही चर्चा है कि जब कांग्रेस के पास भाजपा को सत्ता से बाहर करने का मौका था, तो इसे भुनाया क्यों नहीं…? कांग्रेस अगर अधिकतम संख्या के साथ स्वंय पालिकाध्यक्ष नहीं बना पा रही थी, तो विकास मंच को सर्मथन देकर कम से कम भाजपा को तो सत्ता से बाहर कर सकती थी, तो यह किया क्यों नहीं..?
पालिकाध्यक्ष चुनाव में माकपा ने बचाई साख, कांग्रेस में भीतरघात की चर्चा ने पकड़ा जोर।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। कांग्रेस के 15 पार्षदों के साथ ही माकपा के जीते हुए पार्षद एवं विकास मंच के एक जीते हुए पार्षद के खुले रूप से कांग्रेस में सेट होने की चर्चाएं तो पालिकाध्यक्ष चुनावों से पहले तक एकदम आम थी। लेकिन दोनो ही पार्षदों को कांग्रेस ने खुला छोड़ रखा था व अपनी बाड़ेबंदी में नहीं डाला था। इन चर्चाओं के बीच में कांग्रेस के किसी भी नेता द्वारा माकपा के नेतृत्व से सर्मथन के लिए आग्रह तक नहीं करने के कारण माकपा ने अपने जीते हुए पार्षद को अपने कब्जे में लेकर पालिकाध्यक्ष चुनाव का बहिष्कार करवाया। यही कांग्रेस के लिए बड़ी मिस्टेक साबित हुई एवं जब दोनों पार्षद सेट थे, तो खुला छोड़ा ही क्यों…? यह सवाल पार्टी के आम कार्यकर्ता उठा रहे है। दूसरे दिन पालिका उपाध्यक्ष के चुनावों के दिन जब इन दोनों पार्षदों को कांग्रेस के पूर्व विधायक मंगलाराम गोदारा की गाड़ी में अपने साथ लेकर आ सकते है तो पहले भी यह काम किया जा सकता था ना। वहीं दूसरे दिन खुले आम इन दोनों पार्षदों के कांग्रेस के साथ आने के साथ ही दोनो जनों के पालिकाध्यक्ष चुनाव में भी कांग्रेस के पक्ष में होने की चर्चाएं बलवती हो गई। लेकिन सवाल उठ गया कि जब खुल कर साथ आ गए, तो यह भी साफ हो गया कि पालिकाध्यक्ष चुनाव भी विकास मंच के उस पार्षद ने कांग्रेस को वोट दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठा कि अगर विकास मंच के इस एक पार्षद ने कांग्रेस का साथ दिया तो कांग्रेस के जो अंदर 15 थे उनमें से किसने क्रास वोट किया।
उपाध्यक्ष चुनावों में हुआ बड़ा खेला।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। कांग्रेस पालिकाध्यक्ष चुनाव में अपने भीतरघात को ढूंढने में जुटी ही थी, कि अगले ही दिन और बड़ा खेला हो गया। भाजपा द्वारा छह बार के पार्षद विनोद गिरी गुंसाई को पालिका उपाध्यक्ष प्रत्याशी बनाने के साथ ही कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा में भीतरघात होने के दावे शुरू कर दिए थे, और हर हाल में पालिका उपाध्यक्ष कांग्रेस का बनाने का दावा भी किया। मतदान के दौरान माकपा एवं विकास मंच के एक-एक पार्षद खुलेआम कांग्रेस के साथ आने के कारण यह दावे मजबूत भी लगे। लेकिन परिणाम आने के साथ ही यह साफ हो गया कि कांग्रेस में पालिकाध्यक्ष के चुनावों से भी बड़ा भीतरघात उपाध्यक्ष चुनाव में हुआ है।
सीमांकन के सहारे अति-आत्मविश्वास से हुआ भाजपा की नाव में छेद, नए सिरे से शुरूआत की तैयारी।
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। इस बार के नगरपालिका चुनावों ने भाजपा में दूसरे दर्जे पर चले गए पार्टी के सर्मपित कार्यकर्ताओं का महत्व भी पार्टी में पुन: स्थापित कर दिया गया है। इस बार नगरपालिका चुनावों से पहले किए गए वार्डों के पुर्नसीमांकन में वार्डों को इस प्रकार से बांटा गया कि भाजपा को लाभ मिलना तय था। हालांकि पिछली बार यह कार्य कांग्रेस ने भी किया था। इस बार के इस पुर्नसीमांकन के बाद भाजपा नेतृत्व अति आत्मविश्वास में आ गया था एवं यही कारण रहा कि टिकट वितरण हो या चाहे बागियों को मनाने का काम, पार्टी ने एक तरफा ही सुनवाई की। पार्टी द्वारा सीमांकन के सहारे मिले आत्मविश्वास के कारण 30 सीटों तक जीतने के दावे किए जा रहे थे लेकिन 13 सीटों में सीमटने के साथ ही यह तय हो गया कि पार्टी की नाव पुराने कार्यकर्ताओं के दूर जाने से डूब रही है। ऐसे में पार्षद मतगणना के बाद भाजपा नेतृत्व ने नए सिरे से नई शुरूआत की कवायद शुरू की है, कि पुराने कार्यकर्ताओं को ससम्मान पार्टी से जोड़ा जाए।
राजनैतिक गलतियों से सबक लेने की सीख मिली विकास मंच को, दूबारा क्या मिल पाएगा जनाधार.?
श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स। श्रीडूंगरगढ़ में भाजपा के परम्परागत वोट बैंक में इस बार सेंध लगाने में चुनाव से कुछ दिन पहले ही अस्तित्व में आया नया दल विकास मंच कामयाब रहा। भाजपा विधायक एवं व्यवस्था से नाराज लोगों ने खूल कर मंच को वोट दिए एवं 9 पार्षद भी विजयी हुए। लेकिन विजय प्राप्त करने के बाद राजनीतिक गलतियों का शिकार भी विकास मंच बन गया। पार्षद चुनाव परिणामों के बाद विकास मंच को भाजपा द्वारा पालिकाध्यक्ष पद देने एवं पालिका उपाध्यक्ष भाजपा का बनाने पर दोनो में समझौते का आफॅर भी चर्चा में रहा। लेकिन इस समझौते की सहमति नहीं बन सकी एवं विकास मंच पालिकाध्यक्ष पद से दूर ही रह गया। विकास मंच को भी कांग्रेस द्वारा मजबूर होकर आखिर में भाजपा को पालिका बोर्ड से हटाने के लिए उन्हें सर्मथन देने का सपना सत्ता से दूर रखा गया। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि विकास मंच को फिलहाल अपनी शर्तों पर पालिकाध्यक्ष बनने एवं अपने किए गए वायदों को पूरा कर दिखाना ज्यादा जरूरी था, इस बार तो वोट भाजपा विरोध के मिल गए लेकिन यह विरोध हमेशा कायम रहे जरूरी नहीं। ऐसे में विकास मंच को भी इस चुनाव से अपनी राजनैतिक गलतियों से सबक लेने की सीख मिली है।





