






श्रीडूंगरगढ़ टाइम्स 13 जुलाई 2026। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर द्वारा आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सहजन (मोरिंगा) आधारित कृषि प्रणाली विषय पर तीन दिवसीय किसान कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ सोमवार को किया गया। कार्यक्रम का आयोजन नाबार्ड वित्त पोषित परियोजना के अंतर्गत काजरी परिसर में किया गया। प्रशिक्षण में ज़िले की विभिन्न तहसीलों से 35 किसान हिस्सा ले रहे हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज, बीकानेर के प्राचार्य डॉ. प्रमोद मिश्रा ने किया। उन्होंने कहा कि सहजन एक अत्यंत पौष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर पौधा है, जिसे आयुर्वेद में विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने बताया कि सहजन की पत्तियों एवं फलों में कैल्शियम, विटामिन-सी, विटामिन-ए तथा आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, रक्त की कमी दूर करने, पाचन तंत्र को मजबूत बनाने तथा हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे महंगी दवाइयों पर निर्भर रहने के बजाय प्रकृति के इस अमूल्य उपहार को अपने जीवन और खेती का हिस्सा बनाएं।
काजरी के अध्यक्ष डॉ. नवरत्न पंवार ने कहा कि पश्चिमी राजस्थान में सहजन आधारित खेती खाद्य एवं आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने बताया कि सहजन का उपयोग मानव उपभोग के साथ-साथ पशु आहार एवं चारे के रूप में भी किया जा सकता है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सहजन के मूल्य संवर्धन के माध्यम से किसानों के लिए रोजगार एवं अतिरिक्त आय के नए अवसर भी उपलब्ध हो सकते हैं।
परियोजना के मुख्य समन्वयक डॉ. बीरबल ने बताया कि इस परियोजना के अंतर्गत अब तक 21 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें बीकानेर जिले की विभिन्न तहसीलों के किसान भाग ले चुके हैं। उन्होंने बताया कि प्रत्येक किसान को प्रशिक्षण के साथ लगभग एक हजार सहजन पौधे निःशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अब तक लगभग 250 किसानों ने इस परियोजना के तहत पौधारोपण कर सहजन की खेती शुरू की है तथा कई किसान सहजन पाउडर सहित विभिन्न उत्पाद तैयार कर मूल्य संवर्धन के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में सहजन केवल एक पौधा नहीं, बल्कि टिकाऊ कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर), पर्यावरण संरक्षण और मानव स्वास्थ्य के लिए एक प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहा है। किसानों से अधिकाधिक संख्या में प्रशिक्षण से जुड़कर इस परियोजना का लाभ उठाने का आग्रह किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के संचालन एवं तकनीकी सहयोग में काजरी के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी डॉ. मनोज गोरा एवं डॉ. सीताराम जाट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।








